प्रकृति की कुछ रचनाये मुझे अचम्भित करती हैं
फल में बीज, बीज से पौधा,पौधे से वृक्ष फिर फल
वक्त करिश्मा देखो फल इक दिन वृक्ष से बिछुडता
क्षुधा शांति फल देता वृक्ष देता शीतल छांव सब को
शांति के बाद क्रान्ति शुरू हो जाती फल से निकल
खुदबखुद बीज जा के जमीन गर्भ में समा जाता हैं
वनस्पति,जीव-उत्पत्ति,प्रकृति बहार,बाजार कहर हो
सुन रे इंसा न मना खुशियाँ पाने न गम जाने काहो
बचने को तूफानों से राह मात्र सुकर्म विचार पाने का
जानपहचान शान मान बिछुडे पथिक बन जीने काहो
पथिक अनजाना (सतनाम
सिंह साहनी)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें