जाकिर जी ने “बंदर न बनिये” कहानी से दुनिया को दर्पण
दिखाया
यार मेरे इंसानी बसेरे हैं दर्पणों से भरे पर पसरा दरबंद का
साया हैं
हालात,चौगिर्द फैले ख्यालात जीवन के झंझावात व खुद के
जज्बात
मजबूर इंसान, ज्ञानियों की मशहूर दुकान व मगरूर होते वारसान
हैं
आडम्बरी हंसी, औचित्य की फांस गले फंसी, हो रहे झूठे फरमान
हैं
गैरों से चाहे दुनिया सभी अपनी सोच को करे साकारात्मक जैसा
हैं
प्रश्न जब उठता उनके स्वभाव पर जवाब क्या करें स्वभाव ऐसा
हें?
साकारात्मक सोच के अभिनय हेतू विवश हो इंसान यहाँ भरमाया
हैं
दर्पण दिखाये पूर्वजों ने ? छोडा, बनती मौन जाती पीढी यही
पहचान
सो कुछ भरमाये मोह-ऐश में,कुछ यहाँ काटते सजाये योनि इंसान
हैं
हर रहनुमां सुराह दिखाते पर मानव तो बन गये हैं मतिभ्रष्ट
के रोगी
दर्पण व चेहरे अनेकों जाने किस मजबूरी से इक इंसा कहे ये
मैं नही
न जाने पथिक कैसे इंसा हेतू कहें वह कि, उसकी कोई मजबूरी
होगी
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )
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