हंसता खिलखिलाकर
पथिक अनजाना इस जीवन में
कैसी अदभूत रचना रची उस खुदा ने इस जमीन पर हैं
जाने,माने,पहचाने सभी मात्र दो राहें मौजूद यहीं पर हैं
राह इक बनने की होड धनसंपन्न दूजी चुने सुकर्म छोर
धनी सारी भौतिकता,मान क्रय करे सुकर्मी दिल को हरे
धनी धन बाँट हो आडम्बरी ताउम्र शांति खोज में रहता
सुकर्मी चलता सुराह पर ध्यान आडम्बरों में उलझता हैं
जैसे कोई सच्चरित्र वेश्यालयी आनन्द कल्पना करता हैं
जैसे कोई चरित्रहीन कभी
आत्मा से धिक्कार सहता हैं
हंसता पथिक चलते सुराह पर मृगतृष्णा में जाअटकते हैं
कुछ पाते धन वैभव पर हर पल तो चिन्ता में गुजरतेहैं
सामाजिक मान धन सुरक्षा व भविष्य विषय खटकते हैं
हंसे पथिक जौ बताते सुराह, ईश्वरराह गुरू,बाबा,रहनुमां,
दे शिक्षा, खुद काम क्रोध,लोभ, मोह,अंहकार में विचरते हैं
हैरां हू जो बुद्धिजीवी कहलावे इनके दरबार का पानी भरते
जाने कैसी फांस न निगले न उगले जन- धन के हुये रोगी
जागी आत्मा राह बतावे कैसे? कैसी उसकी कोई मजबूरी--
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें