उसकी कोई मजबूरी होगी

यह रचियता सतनाम सिंह साहनी जो कि पथिक अनजाना नाम से हिन्दी भाषा में ब्लागों पर अपने स्वविचार प्रकाशनार्थ प्रेषित करते हैं कि यह ब्लागर पर चौथी कडी हैं

रविवार, 23 अगस्त 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक ९०३ -- क्यों दुनिया को रोते हो -- पथिक अनजाना

दुनिया में प्राय: कष्ट देते ही तुम किसी को क्यों हो
मानते हो दुनिया ने तुम्हारी राह कष्टों से भर रखी
दुनिया की भर्त्सना सामने लोगों के करते रहते क्यों
चूंकि दुनिया तुझे पा गैरहाजिर भर्त्सना तेरी करतीहैं
दुनिया का उपहास कर तुम आनन्दित क्यों होते हो
दुनिया तेरे परिवार का छिद्र पा उपहासनीय बनाती
कुलमिला वही लौटाते तुम जो कि इंसानों से पाते हो
मैं कैसे तुम्हारा पक्ष लू तुम भी  वही करते रहते हो
जीवन जीना हो या जिन्दगी चाहते तुम यहाँ बीतानी
कौन  तुम गर भूल जावो अनुकरणीय बनेगी कहानी
पात्र  खिलौने होते गैरों के फिर पात्र क्यों कहलावोगे
स्मरणीय तभी बन पावोगे जब कहानी खुद बनावोगे
माना भाग्य व बहता पानी सदैव एक समान होता हैं
वक्त हैं गुजरते किनारे वंदनीय/ निंदनीय रहते होतेहैं
पानी किनारों को याद न रखे क्यों दुनिया को रोते हो
पथिक अनजाना

यदि अभिव्यक्ति को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें

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